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कहानी का शीर्षक है:-  लेडीज टेलर

हमार नाम बब्बन है और हम लेडिजों के सबसे बड़े पुजारी हैं। हमें नहीं लगता कि लेडिजों का हमसे बड़ा क़ायल कोई होगा पूरे याद शहर में। आय हाय हाय हाय!!! लेडिजों की तो बात ही निराली होती है। उनकी हर अदा ख़ास है। उन्हें तो ऊपरवाले ने फ़ुर्सत में नहीं, नौकरी छोड़कर बनाया होगा, पूरे इत्मीनान से। आय हाय हाय हाय!!! ख़ूबसूरत लेडिजों के शहर में रहते हैं हम। याद शहर में। यहां के कॉलेज… यहां के दफ़्तर… यहां के बस स्टॉप… समझिए हुस्न की फ़ैक्टरियां हैं।
ये देखिए, वो देखिए, वहां देखिए, अरे इधर मिस हो गया आपसे। हुस्न ही हुस्न! नज़र ज़रा-सी हटी नहीं कि एक हुस्न की मूरत ये लगा वो खड़ी हो गई। वो लंबे-लंबे बाल, जैसे पार्क में हंसते हुए बच्चे, फिसलपट्टी पर फिसले चले आ रहे हों! वो बलखाती चाल जैसे कोई मासूम सी गिलहरी हमारी हथेली पर फुदक रही हो! आय हाय हाय हाय!!! लेडिजों को तो एक लाइन में खड़ा करके भारत रत्न दे देना चाहिए कि उन्होंने लेडीज होकर कितना रहम किया हम सब पर!
जब लेडिजें बोलती हैं तो लगता है कि किसी दूर पहाड़ पर घंटियां बज रही हैं और जब हम जैंट्स बोलते हैं तो लगता है जैसे घंटाघर के अंदर घुस गए हम। जब लेडिजें चलती हैं तो लगता है जैसे किसी झील के किनारे हंस परेड कर रहे हों और जब हम जैंटस चलते है, तो लगता है जैसे ख़च्चर घास चरने के लिए पहाड़ पर चढ़ गए हों। लेडिजें नहीं होती तो हम सपने किसके देखते? गाने किस पर लिखते? गली में खड़े होकर किसको छेड़ते?
लेकिन लेडिजों से रिलेटेड एक दुख की बात ये है कि हमें लेडिजों ने आज तक घास नहीं डाली। बचपन से आज तक किसी से ये नहीं हुआ कि कह दे कि बब्बन, आप बड़े अच्छे लग रहे हो आज। तो हमने सोचा कि लेडिजों के पास रहने का एक ही कारगर तरीक़ा है, डैडी टेलर हैं। तो उनसे एक क़दम हम आगे निकल गए और हम लेडीज टेलर बन गए।

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हम अपनी कहानी आगे बढ़ाए, इससे पहले हम ऊपरवाले का शुक्र अदा करना चाहते हैं–इस बात के लिए कि लेडिजें आजकल इतनी तरक़्क़ी कर रही हैं कि वो पायलट बन रही हैं, साइंटिस्ट बन रही हैं, इंजीनियर बन रही हैं। इससे हमें कनवीनियंस यूं हुई कि लेडीज टेलर का जॉब जैंटस के लिए पूरी तरह ओपन है। डैडी याद शहर के बड़े पुराने और मशहूर टेलर थे। उनके दादा के टाइम की है हमारी दुकान। नाम है लक्की टेलर्स।
हम से पहले की जेनरेशन का कोई दुल्हा ऐसा नहीं होगा, जो डैडी की सिली हुई शेरवानी पहनकर घोड़ी ना चढ़ा हो। लेकिन हम बचपन से दुल्हे के नहीं, दुल्हन के कपड़े सिलना चाहते थे। हमारा सपना था कि हम लेडिजों के अज़ीज़ों में गिने जाएं। आय हाय हाय हाय!!! और किसी तरीक़े से नहीं तो लेडीज टेलर बनकर ही सही! एक बड़ा पर्सनल-सा, क़रीबी रिश्ता होता है ना लेडीज और लेडीज टेलर का!

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वैसे डैडी चाहते थे कि हम कहीं गवर्मेंट की जॉब ट्राय करें। लेकिन हम उन्हें आख़िरकार मना ही लिए। हमने कहा, “डैडी, ये आपसे ज़्यादा कौन जानता है कि दर्ज़ी का काम सबसे ज़्यादा सबाब का काम होता है? जो इंसान जैसा दिखना चाहता है, उसकी ख़्वाहिश पूरी करते हैं हम। ख़्वाबों को कॉटन और टेरीकॉट में लपेटते हैं हम। एक तरह से रूह को एक ख़ूबसूरत जामा पहनाते है हम।”
डैडी मान गए। मेरी निकल पड़ी और हम याद शहर की आधी से ज़्यादा लड़कियों के क़रीबी बन गए। शुरू-शुरू में तो समझ ही नहीं आता था कि इतना हुस्न बर्दाश्त कैसे करें? आय हाय हाय हाय!!! हज़ारों-हज़ारों बार पहली नज़र में प्यार हो गया हमें। दिल है, व्हाट टू डू? लेकिन हुस्न और हमारा ज़्यादा मेलजोल हुआ नहीं था।
बचपन में तो अक्सर नाप लेते टाइम हमारे हाथ कांपने लग जाते थे। हम नाप गड़बड़ लेते थे। डैडी अब बीमार रहते थे तो दुकान भी हम ही चला रहे थे। अच्छा, हमारी भी मिस्टेक नहीं थी क्योंकि हम काम तो बड़ा हैंडल कर लेते थे। लेकिन हुस्न हैंडल नहीं कर पाते थे।
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एक दिन मॉर्निंग और इवनिंग के बीच में दो घटनाएं घटीं जिनसे हमारी ज़िंदगी बहुत संगीन तरीक़े से इफ़ेक्ट होने वाली थी। गली में सामने की ओर साइकिल के स्टैंड के बग़ल में एक और दर्ज़ी ने सुबह-सुबह दुकान का उद्घाटन कर दिया। लक्की टेलर्ज के तर्ज़ पर न्यू लक्की टेलर्ज और शाम को एक ख़ूबसूरत लड़की दुकान में आकर बोली, “सुनिए टेलर मास्टर आप ही हैं?” आप लोग सब पढ़े-लिखे हैं।
हार्टअटैक का नाम तो सुना ही होगा। बड़े लोगों की बीमारी है। हमारे ताया जी को हुई थी। लेकिन हमको जो हार्टअटैक उस वक़्त हुआ, वो सारे हार्टअटैकों से बड़ा हार्टअटैक था। एकदम धक्क-सा लगा था कलेजे में हुस्न का बमगोला। हमारा तो दिमाग़ सन्ना गया एकदम। ख़ूबसूरती ऐसी कि ख़ूबसूरती को भी लगे, हम भाग के जाएं, थोड़ा-सा मेकअप लगा लें और सोचे कि इनके सामने तो हम फीके पड़ गए भैया!
बोलीं, “मुझे कुछ कपड़े बनवाने हैं लेकिन जल्दी। बना पाएंगे आप?” हमारा बस चलता तो हम सारी दुकान बंद करके बस उनके पर्सनल टेलर बन जाते। मोहतरमा की सेवा में लग जाते। हमने कहा, “जी बताइए।”
मोहतरमा बड़ी तैयारी से आई थीं। जो-जो बनवाना था, उसका एक नमूना साथ लाई थीं। हमारे नापने वाला फीता उनके कहीं आसपास फटक नहीं पाया। उन्होंने कुछ कपड़े सीने को दिए और फिर चली गईं। जाते-जाते रसीदबुक में नाम लिखवाया–शगुफ़्ता। आय हाय हाय हाय!!! नाम थोड़ी था? जैसे मोतियों की माला पिरो दी हो किसी रेश्मी धागे में। हमने उसी पल डिसाइड कर लिया कि अगर कोई लड़की मिसिज़ बब्बन होने के लायक है पूरे याद शहर में, तो ये है।
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आय हाय हाय हाय!!! हमने सोचा कि अपनी पूरी कला झोंक देंगे उनके कपड़े बनाने में! लेकिन इधर दिन कुछ ख़राब चल रहे थे। जैसा हमने बताया था कि लेडिजों के क़रीब जाते ही हम घबरा जाते थे और सारा नाप ग़लत कर देते थे। इस कारण से कई कस्टमर शिकायत लेकर आने लगे। कई तो ब्लाउज़ काउंटर पर फेंक जाते थे। पुश्तैनी धंधे को हम नाली में फेंके जा रहे थे।
धीरे-धीरे बात फैलने लगी कि लक्की टेलर्ज बंद होने वाला है। अच्छा, हमें इस सबका होश ही नहीं था। हम तो एक हज़ार एकवीं बार पहला प्यार कर बैठे थे… शगुफ़्ता जी से। वो आती थीं कभी-कभी दुकान में। और बाक़ी टाइम आती थी ख़्वाबों में।
हमारा तो ये हाल था जैसे हम शराबी हों। शगुफ़्ता जी के प्रेम में रोड़ के किनारे टुन्न पड़े हो। या कोई दमची हो जो धुएं में धुत्त अपनी दुनिया में गुम हो और पॉकेटमार मस्त उसकी पॉकेट मार रहा हो।
अचानक सेंसिबल इंसान से हम बड़ी चिड़ीमार लवर टाइप हो गए थे। उधर लंका जलने वाली थी और हम इधर अपनी मोहब्बत के घोड़े पर सवार एक खाई की ओर चले जा रहे थे… टगबग टगबग, टगबग टगबग।
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जैसे-जैसे प्रॉब्लम बढ़ती जा रही थी, वैसे-वैसे शगुफ़्ता जी के लिए हमारा प्यार भी। ये सच है कि अभी हमारा प्यार बस एक अठन्नी भर था। हम अपनी अठन्नी लिए चले जा रहे थे इस कोशिश में कि वो भी अपनी अठन्नी जोड़ दे और ख़र्चा पूरा हो जाए। लेकिन लग रहा था कि एक हज़ार एकवीं बार पहला प्यार कर चुकने के बाद हम अभी भी अनाड़ी के अनाड़ी ही थे।
वैसे शगुफ़्ता जी से हमारी फ़्रेंडशिप जैसी हो गई थी। हमें लगता था कि कभी-कभी वो बस बहाने से हमसे मिलने आती थीं। आख़िर किसी के कपड़ों की सिलाई कितनी बार उधड़ सकती है? और पांच सौ का ख़ुला लेने सिर्फ़ हमारे पास क्यों भाई? मीन्स कुछ बात थी! नहीं?
एक दिन हमने सोचा कि इशारा कर ही दें। वो आईं। हमने नुक्कड़ पर धन्नू चायवाले से स्पेशल चाय मंगवाई। आप लोग तो जानते ही हैं कि छोटे शहरों में स्पेशल चाय का मतलब होता है कि उसमें आव देखो ना ताव, दूध उड़ेल दो। चाय आई। शगुफ़्ता जी ने पी। बोली, “स्पेशल चाए मंगवाई है आपने मेरे लिए?” हमने मौक़ा देखकर धावा बोल दिया।
“हां आप तो हैं ही स्पेशल। क्या करें?” और उन्हें सिग्नल करते हुए एक अठन्नी काउंटर पर उनकी ओर सरका दी। हमने कहा, “अगर आप अपनी अठन्नी देंगी तो एक रुपैया पूरा हो जाएगा।”
उन्होंने अपने बैग में हाथ डाला और एक अठन्नी निकाली। यानी आई लव यू कह दिया। “शायद नहीं! अच्छा ठीक है लीजिए अठन्नी। अब सौ का चेंज दे देंगे?” नोट दिया तो उंगली छू गई।
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आय हाय हाय हाय!!! हम ये झन्नाटा ठीक से एबजोर्ब नहीं कर पाए थे कि ऊपरवाले ने उसके ऊपर से एक और बहुत बड़ा झन्नाटा हमारी ओर भेज दिया। डैडी ने बुलाया। बिस्तर पर लेटे-लेटे कहा, “बब्बन, नुक़सान बढ़ता जा रहा है। हमारे सारे कस्टमर सामने वाले न्यू लक्की टेलर्ज के पास जाने लगे हैं। जो जमापूंजी थी सब ख़त्म हो गई है। दुकान शायद बंद करनी पड़े बेटा।” डैडी जी ने जो बेड पर लेटे-लेटे कहा था। उससे हमारे तोते उड़ गए थे। बेड पर लेटे हुए थे वो और बेड से झट से खड़े हो गए हम।
साठ साल पुरानी दुकान हमारी हरकतों, हमारे निकम्मेपन की वजह से बंद होने जा रही थी। हमें कुछ भी करना था इसे रोकने के लिए। हम रात को भूत की पिक्चर देखने से डरते हैं, लेकिन वैसे काफ़ी बहादुर हैं। मोहल्ले में किसी की भी पतंग खंभे पर अटक जाती है तो सबसे पहले सब लोग हमें ही देखने लग जाते हैं कि बब्बन भाई, तुम्हीं कुछ कर सकते हो। हमने दुकान वापस आकर उसे बड़े प्यार से देखा। यहीं तो हम नाक बहाते हुए आए थे डैडी से टॉफी के लिए एक रुपैया मांगने के लिए। यहीं तो पहली बार एक कस्टमर से पहला प्यार हुआ था। यहीं तो डैडी से पहली बार कैंची चलाना सीखा था। अरे, यही दुकान तो थी हमारा सबकुछ! इसे बचाना था हर हालत में।
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अगले दिन शगुफ़्ता जी फिर आईं। पांच सौ का खुला चाहिए था। हम कुछ बुझे-बुझे से थे। उन्होंने पूछा। हमसे रहा ना गया। सब बता दिया। बोलीं, “आप कुछ नया एक्साइटिंग आइडिया लाइए ताकि ये न्यू लक्की टेलर्ज बोरिंग और पुराना लगे।” मैंने कहा, “आप मेरे साथ एक जगह चलेंगी?” वो मुस्कराई, बोली, “ठीक हैं। आपके लिए इतना तो कर ही सकते हैं।” हम निकले। ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हस्बैंड ओर वाइफ़ साथ में जा रहे हो फ़ैमिली की प्रॉब्लम से निपटने। सामने न्यू लक्की टेलर्ज का मालिक, हमारा नाम चुराने वाला चोर खड़ा लोमड़ी की तरह हंस रहा था।
हम रिक्शा लेकर पुराने शहर में पहुंचे। एक गली में एक पुराने लकड़ी के दरवाज़े पर खटखटाए। ये घर था डैडी के पुराने दोस्त अहमद चाचा का। याद शहर के एक और मशहूर रिटायर्ड दर्जी। दो घंटे उनके साथ बैठा रहा। बातों से कमरा भर गया। वहीं बैठकर मैंने बहुत बड़ा फ़ैसला किया। दो दिन बाद लक्की टेलर्ज का साइन बोर्ड उतार दिया गया और फिर हिम्मत की सीढ़ी पर चढ़कर, उम्मीद का हथौड़ा थामे, हमने धीरे से लक्की डिज़ाइनर्स का नया चमचमाता बोर्ड लगा दिया।

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हमने न्यू लक्की टेलर्ज के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया था। हमने मोहब्बत की जंग में भी अगला मोर्चा खोलने का फ़ैसला कर दिया था–शगुफ़्ता जी से अपने प्रेम का इजहार करने का। प्रेम का लोहा गर्म था। टाइम आ गया था। जैसे चोंच छोटी कर लेने भर से छछूंदर चूहा नहीं बन सकता, जैसे सीना फुलाने भर से पोमेरियन बुलडॉग नहीं बन सकता, ऐसे ही सिर्फ़ बोर्ड बदलने से तो लक्की टेलर्ज, लक्की डिज़ाइनर्स नहीं बन सकता था। डूबते बिज़नेस में ये हालत थी कि अगर दुकान का नाम लक्की सोना फ्री डिस्ट्रब्यूशन सेंटर भी रख देते तो भी शायद उसका कोई उद्धार नहीं कर पाता।
लेकिन आप तो जानते ही हैं कि हम चतुर चोर हैं। जब सौ जीनियस मरे थे तब हमारा जनम हुआ था। हमारे पास एक प्लान था। जैसे मिस्टर इंडिया पिक्चर में अनिल कपूर के हाथ ग़ायब होने का सीक्रेट फ़ॉर्मूला लग गया था, वैसे ही उस रात को अहमद चाचा के घर जाकर हमारे हाथ एक सीक्रेट फ़ॉर्मूला लग गया था। अहमद चाचा अपने ज़माने में लेडिजों की ड्रेसों में एक बड़ा ही ख़ूबसूरत अहमद कट बनाते थे। उन्होंने बना दिया और हमको और हमारी होने वाली वाइफ़ शगुफ़्ता जी को दे दिया।
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हैं जी? हम ‘होने वाली वाइफ़’ किस अधिकार से कह रहे हैं? क्यों आपकी होने वाली वाइफ़ हैं क्या? देखिए ज़्यादा पूछताछ मत कीजिए हमसे। हमें लगातार पिछले कई दिनों से ऐसे हिंट मिल रहे थे कि हमारी अठन्नी अब रुपए में कन्वर्ट होने वाली थी। शगुफ़्ता जी ने वैसे तो कुछ कहा नहीं, और कहती भी कैसे, शर्म तो लेडिजों का गहना होती है, आप तो जानते ही हैं! लेकिन हमारे दिल के एंटीने को लगातार सिग्नल मिल रहे थे कि मिस शगुफ़्ता मिसिज़ बब्बन बनने का इरादा कर रही थीं।
चूंकि हम चतुर चोर हैं, इसलिए अहमद चाचा के डिज़ाइन को फ़ौरन अपना नाम बदल के बब्बन कट रख दिया। जैसे बात फैली, नए डिज़ाइन की भूखी-प्यासी लड़कियां तिलचट्टों की तरह लक्की डिज़ाइनर पर खींची चली आ रही थीं।
आय हाय हाय हाय!!! अच्छे दिन वापस आ गए थे। हमने उन सबके साइज़ तो ले लिए थे पर अभी तक किसी के नाप पर कैंची चलाई नहीं थी क्योंकि हमारी ख्वाहिश थी कि जो नई जानलेवा डिज़ाइन हम अहमद चाचा के वहां से चुराकर लाए थे, जिसको हम सारे याद शहर का हॉटेस्ट फ़ैशन ट्रेंड बनाना चाह रहे थे, उस डिज़ाइन की ड्रेस हम सबसे पहले अपनी होने वाली पत्नी शगुफ़्ता जी के लिए एक ड्रेस में यूज़ करें।
हमने कहा, “शगुफ़्ता, शादी की बात कर ली जाए क्या?” शगुफ़्ता ने शर्माते हुए कहा, “जी मैं भी आपसे ये बात करना चाह रही थी। थोड़ा जल्दी होना चाहिए।” मैंने कहा, “अरे तुमसे ज़्यादा जल्दी तो हमें है। हम चाहते हैं कि शादी का जोड़ा तुम बब्बन कट में पहनो।” शगुफ़्ता ने कहा, “जी, हम भी यही चाहते हैं। बारह दिन में हमारा निकाह है और हमारे होने वाले शौहर ने ख़ास कह रखा है कि हम यहीं से अपनी शादी का जोड़ा बनाएं। उनकी पिछली तीन पुश्तों के कपड़े लक्की टेलर्ज ने सिले हैं ना, इसलिए!” बस इतनी सी थी यह कहानी…
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